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।। पुलिस की ‘चौखट’ से चंद कदम दूर बिक रहा ‘सफेद जहर’, आखिर किसका है संरक्षण?

सवाल 100 मीटर का: पुलिस चौकी के करीब कैसे सज रही हैं नशे की महफिलें?

अजीत मिश्रा (खोजी)

🚨 छावनी में नशे का ‘खुला खेल’: पुलिस की नाक के नीचे बर्बाद होता बचपन🚨

मंगलवार 20 जनवरी 26, उत्तर प्रदेश।

बस्ती।। जनपद बस्ती का छावनी इलाका इन दिनों एक बेहद खतरनाक और आत्मघाती मोड़ पर खड़ा है। जिस पुलिस प्रशासन के कंधों पर कानून व्यवस्था और सुरक्षा की जिम्मेदारी है, उसी की नाक के नीचे नशे का अवैध कारोबार न केवल फल-फूल रहा है, बल्कि अब यह एक सामाजिक कोढ़ बन चुका है। हालिया रिपोर्टों ने छावनी क्षेत्र में सक्रिय नशा तस्करों और उनके बढ़ते हौसलों की जो तस्वीर पेश की है, वह स्थानीय प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करती है।

💫 खाकी की ‘चौखट’ और नशे की ‘दुकान’

सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि छावनी थाना क्षेत्र के अंतर्गत कई संवेदनशील इलाकों में पुलिस चौकी से महज 100-200 मीटर की दूरी पर नशे के सौदागर अपनी दुकानें सजा रहे हैं। यह स्थिति दो ही बातों की ओर इशारा करती है: या तो स्थानीय पुलिस अपनी जिम्मेदारी निभाने में पूरी तरह अक्षम है, या फिर अपराधियों को किसी “अदृश्य संरक्षण” का वरदान प्राप्त है। जब पुलिस की सायरन वाली गाड़ियाँ गलियों से गुजरती हैं, तब भी नशे की बिक्री का बेखौफ जारी रहना व्यवस्था की विफलता का जीता-जागता प्रमाण है।

क्षेत्र में चर्चा का विषय बने सोनकर, गौतम, चौहान जैसे नाम (चाहे वे काल्पनिक ही क्यों न हों) उस कड़वी सच्चाई को बयां करते हैं जिसे समाज अब तक दबाता आया है। नशे के इस जाल में स्थानीय युवाओं को न केवल ग्राहक बनाया जा रहा है, बल्कि उन्हें धीरे-धीरे इस अपराध के दलदल में धकेला जा रहा है। शाम ढलते ही बाहरी तत्वों की संदिग्ध आवाजाही और बढ़ता जमावड़ा स्थानीय परिवारों के लिए सुरक्षा का बड़ा संकट बन गया है।

💫 केवल पुलिस नहीं, सामाजिक चेतना की भी दरकार

समीक्षा का एक पहलू यह भी है कि नशे के खिलाफ लड़ाई सिर्फ एफआईआर (FIR) तक सीमित नहीं रह सकती। स्वास्थ्य विशेषज्ञों और जागरूक ग्रामीणों का मानना है कि जब तक पुलिसिया कार्रवाई के साथ-साथ सामाजिक बहिष्कार और जागरूकता अभियान नहीं जुड़ेंगे, तब तक इस जड़ को काटना नामुमकिन है। स्कूल और पंचायतों को इस मोर्चे पर आगे आना होगा।

छावनी की जनता अब आश्वासनों से ऊब चुकी है। प्रशासन को चाहिए कि:

👉 संदिग्ध इलाकों में ड्रोन और सीसीटीवी के जरिए निगरानी बढ़ाई जाए।

👉 बीट स्तर के पुलिस अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए।

👉 नशे के मुख्य सौदागरों के खिलाफ त्वरित और पारदर्शी कार्रवाई हो ताकि जनता में विश्वास बहाली हो सके।

💫 प्रशासन से सीधे सवाल: जवाब कौन देगा?

छावनी में बिगड़ते हालात अब केवल ‘चिंता’ का विषय नहीं, बल्कि ‘जवाबदेही’ का मामला हैं। स्थानीय जनता और ‘बस्ती की पुकार’ प्रशासन से ये चुभते हुए सवाल पूछती है:—

🔥 दूरी का बहाना क्यों? जब पुलिस चौकी से चंद कदमों की दूरी पर नशे का कारोबार होता है, तो क्या इसे पुलिस की ‘अनभिज्ञता’ माना जाए या ‘मौन सहमति’?

🔥 बीट प्रणाली विफल क्यों? हर इलाके के लिए एक बीट आरक्षक जिम्मेदार होता है। क्या उच्च अधिकारियों ने कभी यह पूछा कि उनके क्षेत्र में संदिग्धों का जमावड़ा कैसे लग रहा है?

🔥 सिर्फ प्यादों पर कार्रवाई क्यों? अक्सर छोटे नशेडियों को पकड़कर खानापूर्ति कर दी जाती है। आखिर उन ‘बड़े मगरमच्छों’ और मुख्य सप्लायरों तक कानून के हाथ क्यों नहीं पहुँच पा रहे?

💫 शासन के लिए विशेष अपील:—

हम बस्ती जिला प्रशासन और पुलिस अधीक्षक से मांग करते हैं कि छावनी क्षेत्र में ‘ऑपरेशन क्लीन’ चलाया जाए।

इंटेलिजेंस विंग की तैनाती: स्थानीय पुलिस के साथ-साथ सादे कपड़ों में खुफिया विभाग के जवानों को लगाया जाए ताकि अपराधियों और उनके मददगारों का पर्दाफाश हो सके।

संवाद और सुरक्षा: ग्रामीणों के मन से डर निकालने के लिए पुलिस-पब्लिक मीटिंग (चौपाल) का आयोजन हो, जहाँ लोग बिना डरे गुप्त रूप से जानकारी साझा कर सकें।

नशा मुक्ति केंद्रों की सक्रियता: केवल जेल भेजना समाधान नहीं है; युवाओं को इस दलदल से निकालने के लिए सरकारी नशा मुक्ति सहायता केंद्रों को ब्लॉक स्तर पर सक्रिय किया जाए।

समय अब हाथ से निकल रहा है। छावनी की गलियां ‘सुरक्षा’ मांग रही हैं, ‘सफेद जहर’ नहीं।यदि समय रहते छावनी को इस नशे की गिरफ्त से नहीं निकाला गया, तो आने वाली पीढ़ी हमें माफ नहीं करेगी। प्रशासन की चुप्पी अब ‘सहमति’ मानी जाने लगी है—इसे तोड़ने का वक्त आ गया है।

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